उत्तराखंड की यात्रा मेरी
भाग - 2: बाबा के चरणों में आत्मा का स्पर्श
बाबा नीब करौरी के दर्शन – एक अलौकिक क्षण
नीब करौरी बाबा का धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, एक आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। जब हमने मंदिर परिसर में कदम रखा, तो हवा में एक अनजानी पवित्रता थी। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं बाबा हर भक्त के मन की बात सुन रहे हों।
हमारे हाथ में प्रसाद था, आंखों में श्रद्धा, और हृदय में अनगिनत प्रश्न। जैसे ही हमने बाबा की मूर्ति के दर्शन किए — वो शांत मुद्रा, वो सरल दृष्टि, और वो दिव्यता — मेरी आत्मा थम-सी गई। मैंने हाथ जोड़कर मन ही मन प्रार्थना की — “बाबा, बस मेरे जीवन में सच्चाई और सेवा का मार्ग बना देना।”
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रमेश तिवारी जी का भावपूर्ण चढ़ावा
वहाँ पहुँचते ही उमेंद्र भैया के मित्र से मुलाकात हुई, जो मुंबई से आने वाले रमेश तिवारी जी के गहरे दोस्त थे। रमेश जी खुद इस बार नहीं आ सके थे, लेकिन उनका विश्वास इतना दृढ़ था कि उन्होंने मुझे ₹10,000 अपने नाम से चढ़ावे के लिए भेजे।
मैंने वो राशि अपने खाते से निकाली और बाबा के चरणों में रमेश तिवारी जी के नाम से चढ़ा दी। यह अनुभव बहुत भावुक कर देने वाला था। एक व्यक्ति जो वहाँ मौजूद नहीं था, उसकी श्रद्धा वहाँ हवा में महसूस हो रही थी।
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मंदिर परिसर में बिताए अनमोल क्षण
हम लगभग सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक मंदिर परिसर में ही रहे। इस बीच सैकड़ों भक्त आए, गए, लेकिन हर किसी की आंखों में एक विशेष चमक थी – जैसे हर कोई यहां कुछ पाने नहीं, कुछ छोड़ने आया हो… मोह, अहंकार, चिंता।
वहाँ के पेड़ों की छांव में बैठकर हमने आपस में गहन बातें कीं। बाबा के प्रसाद में मिला खिचड़ी का एक-एक दाना जैसे आत्मा को तृप्त कर रहा था। पहाड़ी हवा में कुछ ऐसा था जो मन को भीतर तक ठंडक दे रहा था।
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प्राकृतिक छटा – बादलों में लिपटे देवदार
मंदिर के आस-पास का नज़ारा कल्पनाओं से भी परे था। पहाड़ों की ऊँचाई, बादलों का उन पर गिरना, देवदार के वृक्षों की कतारें, और बीच-बीच में सुनाई देती पक्षियों की मीठी आवाज़ें — यह सब मिलकर ऐसा लगता था जैसे स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आया हो।
मैं बार-बार उन नज़ारों को अपनी आंखों में कैद करना चाहता था, लेकिन पता था – कुछ अनुभव सिर्फ दिल में ही बसाए जाते हैं।
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वापसी की ओर – मन में शांति, आँखों में दृश्य
शाम लगभग 3 बजे, हम वापस चल दिए ताकि समय रहते हल्द्वानी पहुँच सकें। बस की खिड़की से बाहर झाँकते हुए मैं हर उस दृश्य को धीरे-धीरे आँखों में उतार रहा था। वो खाई, वो मोड़, वो हवा — सब अब डर नहीं थे, बल्कि अपनापन महसूस करा रहे थे।
हल्द्वानी पहुँचकर हम एक स्थानीय रेस्टोरेंट गए जहाँ का खाना शुद्ध, गर्म और स्नेह से भरा था। शायद ज़िंदगी में सच्चा स्वाद केवल भूख और संतोष के मेल से ही आता है।
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🌟 भाग - 3 में आने वाला है: नैनीताल की यात्रा, नैना देवी दर्शन, बड़ी झील की शांति और मेरी आत्मा का एक और जागरण...
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