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Showing posts from June, 2025

सपनों का शहर

 हंसवर और बसखारी : मेरे सपनों का इलाका” ✍️ लेखक - विकास मौर्य, ग्राम पृथ्वीपुर, अंबेडकर नगर (उत्तर प्रदेश) उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में स्थित मेरा गांव पृथ्वीपुर प्रकृति, आस्था और सरल जीवन की जीवंत मिसाल है। इस गांव के पास बसा है हंसवर, और पास ही स्थित है बसखारी — ये दोनों कस्बे मेरे लिए केवल स्थान नहीं, बल्कि आत्मा से जुड़ी पहचान हैं। इन्हीं रास्तों से होकर मेरे जीवन के सपने आकार लेते हैं। --- 🌊 घाघरा नदी : जीवन और संस्कृति की धार पूरा क्षेत्र घाघरा नदी के तट पर बसा है। यह नदी हमारे खेतों को पानी देती है, बच्चों को खेल की जगह देती है और बड़ों को आस्था की अनुभूति। सुबह की ठंडी हवा और नदी का शांत प्रवाह मन को सुकून देता है। --- 🕌 बसखारी की दरगाह : एकता और श्रद्धा का केंद्र बसखारी में स्थित है एक प्रसिद्ध दरगाह, जहाँ बाबा साहब की मजार है। यह स्थान केवल मुसलमानों का ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लोगों का आस्था स्थल है। यहाँ हर मज़हब के लोग चादर चढ़ाने, मन्नत मांगने और मन की शांति पाने आते हैं। --- 🛍️ हंसवर : गांवों की धड़कन और बाजार का केंद्र हंसवर एक जीवंत कस्बा है, जो हमार...

बूंदों में बसी मोहब्बत

: उपन्यास का नाम: "बूंदों में बसी मोहब्बत" अध्याय 1: जब दिल पहली बार धड़का लखनऊ की गलियों में एक सर्द शाम उतर चुकी थी। ठंडी हवा किताबों के पन्नों को उड़ाने की कोशिश कर रही थी, पर वो लड़का — शिवम — अपने कमरे में बैठा बस एक ही चेहरा सोच रहा था। अंजलि का। वो सिर्फ उसकी बुआ की बेटी नहीं थी, वो उसके दिल का सबसे कीमती हिस्सा बन चुकी थी। चार साल पहले एक शादी समारोह में पहली बार वो आमने-सामने आए थे। हँसी-ठिठोली के बीच जो हल्की झिझक शुरू हुई थी, वो अब एक गहरा, मजबूत रिश्ता बन चुकी थी। शिवम, लखनऊ में रहकर पढ़ाई कर रहा था — दूर था, पर दिल से अंजलि के सबसे करीब। अंजलि, ओरैया के एक साधारण परिवार की लड़की — पिता की किराने की दुकान, माँ गृहिणी, एक बड़ा भाई और छोटी बहन जो अभी 10वीं में थी। पर अंजलि का संसार बस एक नाम में सिमटा था — शिवम। रात के सन्नाटे में, मोबाइल की स्क्रीन पर जब व्हाट्सएप की हरी बत्ती जलती, तो शिवम को लगता कि उसकी दुनिया रोशन हो गई। "सोई नहीं अब तक?" "तुम्हारे बिना नींद कहाँ आती है," अंजलि की लिखावट में मोहब्बत के फूल खिलते। धीरे-धीरे चैट से कॉल, कॉल से...

उत्तराखंड की यात्रा मेरी 4

 🌄 भाग - 4: लौट कर बुद्ध हुआ — मन की यात्रा का प्रारंभ लौटते हुए एक नया 'मैं' साथ था जब मैं उत्तराखंड से लौटा, तो शरीर थका था पर मन तरोताज़ा। घर की चौखट पर कदम रखते ही माँ की तस्वीर पर नजर गई और बाबा के दर्शन की पहली झलक फिर से सामने आ गई। बाहर से तो मैं वही विकास मौर्य था, लेकिन भीतर एक नई चेतना जन्म ले चुकी थी। पहले जहां जीवन भागदौड़ और अनिश्चितता से भरा लगता था, अब एक शांति और स्पष्टता महसूस होने लगी थी। जैसे बाबा और नैनी माता ने मन में चुपचाप कुछ जड़ें रोप दी हों, जिनसे आत्मविश्वास, विनम्रता और भक्ति के अंकुर फूटने लगे। --- गाँव में लोगों ने पूछा – "वहाँ कैसा लगा?" जब गाँव लौटकर अपने मित्रों, परिचितों और परिजनों को यात्रा के बारे में बताया, तो उनके चेहरे पर हैरानी और श्रद्धा की झलक दिखी। किसी ने पूछा – "नीब करौरी बाबा के दर्शन से क्या मिला?" मैंने मुस्कराकर बस इतना कहा – "एक ऐसी शांति, जो शब्दों से परे है। एक ऐसा अनुभव, जो जीवनभर साथ रहेगा।" --- मेरे अंदर के बदलाव – एक आत्म-चिंतन की शुरुआत इस यात्रा के बाद मैंने महसूस किया कि: हर यात्रा सिर्फ ...

उत्तराखंड की यात्रा मेरी 3

 भाग - 3: नैनीताल — झीलों, देवियों और धुंध से लिपटा शहर बाबा के बाद नैनी माता का बुलावा जब पहली यात्रा पूरी हुई, तो मन शांत था, लेकिन आत्मा में एक और प्यास बाकी थी। बाबा के दर्शन के कुछ समय बाद एक दिन फिर उमेंद्र भैया आए और बोले — "विकास, इस बार फिर चलते हैं उत्तराखंड। इस बार नैनीताल भी चलेंगे, बाबा के दर्शन भी फिर से होंगे, और नैनी झील भी देखेंगे।" दिल की गहराइयों से एक ही शब्द निकला — चलते हैं! शायद इस बार माँ का बुलावा था — नैनी देवी माँ का। --- दूसरी यात्रा की शुरुआत – वही उत्साह, वही ऊर्जा हमने फिर वही तैयारी की – टिकट बुकिंग, कपड़े, और कुछ घरेलू खाना। लेकिन इस बार मन में ज़्यादा स्थिरता थी, जैसे एक अनुभवी यात्री बन चुका था। लखनऊ से काठगोदाम की ट्रेन थी और मन में चित्र बनने लगे थे – ऊँचे पहाड़, झील में उतरता सूरज, मंदिर की घंटियाँ और ठंडी हवा। --- काठगोदाम से नैनीताल की ओर – पहाड़ों की बाहों में जब हम काठगोदाम पहुँचे, वहाँ से नैनीताल की बस ली। जैसे-जैसे बस चढ़ाई पर चढ़ती गई, हम बादलों में खोते चले गए। रास्ता ऐसा कि एक ओर गहरी खाई, दूसरी ओर चट्टानों से चिपकी सड़क – पर हर ...

उत्तराखंड की यात्रा मेरी

 भाग - 2: बाबा के चरणों में आत्मा का स्पर्श बाबा नीब करौरी के दर्शन – एक अलौकिक क्षण नीब करौरी बाबा का धाम सिर्फ एक मंदिर नहीं, एक आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। जब हमने मंदिर परिसर में कदम रखा, तो हवा में एक अनजानी पवित्रता थी। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं बाबा हर भक्त के मन की बात सुन रहे हों। हमारे हाथ में प्रसाद था, आंखों में श्रद्धा, और हृदय में अनगिनत प्रश्न। जैसे ही हमने बाबा की मूर्ति के दर्शन किए — वो शांत मुद्रा, वो सरल दृष्टि, और वो दिव्यता — मेरी आत्मा थम-सी गई। मैंने हाथ जोड़कर मन ही मन प्रार्थना की — “बाबा, बस मेरे जीवन में सच्चाई और सेवा का मार्ग बना देना।” --- रमेश तिवारी जी का भावपूर्ण चढ़ावा वहाँ पहुँचते ही उमेंद्र भैया के मित्र से मुलाकात हुई, जो मुंबई से आने वाले रमेश तिवारी जी के गहरे दोस्त थे। रमेश जी खुद इस बार नहीं आ सके थे, लेकिन उनका विश्वास इतना दृढ़ था कि उन्होंने मुझे ₹10,000 अपने नाम से चढ़ावे के लिए भेजे। मैंने वो राशि अपने खाते से निकाली और बाबा के चरणों में रमेश तिवारी जी के नाम से चढ़ा दी। यह अनुभव बहुत भावुक कर देने वाला था। एक व्यक्ति जो वहाँ मौजूद न...

उत्तराखंड की यात्रा मेरी

 ✨ मेरी पहली यात्रा उत्तराखंड की — एक आत्मिक अनुभव लेखक – Drx. विकास मौर्य स्थान – ग्राम पृथ्वीपुर, अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश --- प्रस्तावना: एक बुलावा जो आत्मा तक पहुँचा कभी-कभी जीवन में ऐसा अवसर आता है जो हमारी आत्मा को छू जाता है। ऐसा ही एक क्षण मेरी जिंदगी में उस दिन आया, जब मेरे बड़े भैया के प्रिय मित्र उमेन्द्र सिंह जी अचानक मेरे पास आए। भैया कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे, और ऐसे में उमेंद्र भैया ने मुझसे एक सवाल पूछा – "विकास, क्या तुम मेरे साथ बाबा नीब करौरी के धाम चलोगे?" यह सवाल नहीं, एक निमंत्रण था। एक ऐसा बुलावा, जिसे मैंने अनसुना नहीं किया। मेरे दिल ने तुरंत कहा – हाँ! शायद बाबा नीब करौरी महाराज का बुलावा ही था, जो इस यात्रा के रूप में मेरे भाग्य में लिखा गया था। --- टिकट की कहानी: जब नियति खुद रास्ता बनाती है उमेंद्र भैया टिकट बुक कराने साइबर कैफे गए, पर किस्मत में कुछ और ही लिखा था। टिकट बुक नहीं हो पाया। थोड़ा निराश थे, लेकिन मैंने उन्हें रोकते हुए कहा – "लाइए भैया, मैं अपने मोबाइल से करता हूं।" फिर क्या था, पेटीएम ऐप खोला, सीट ढूंढी, और शनिवार की रात...

heerapur ka bazar

 हीरापुर गाँव का बाज़ार – तहसील टांडा, ब्लॉक बसखारी, जिला अम्बेडकर नगर (पिनकोड 224190) हीरापुर गाँव का स्थानीय बाजार एक प्रमुख खरीदारी स्थल है, जो ग्रामीण और आसपास के क्षेत्र के लोगों की रोज़मर्रा की आवश्यकताओं को पूरा करता है। यह बाजार मुख्य रूप से बुधवार और रविवार को लगता है और शाम के समय सक्रिय रहता है। बाजार में उपलब्ध सुविधाएँ और दुकानें: कपड़े की दुकानें – पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के परिधानों की बिक्री। जूते-चप्पल की दुकानें – दैनिक उपयोग के फुटवियर उपलब्ध हैं। सब्जी मंडी – ताजे फल और सब्ज़ियों की बिक्री। हलवाई की दुकानें – मिठाई, नमकीन, और अन्य खाद्य वस्तुएं। इलेक्ट्रॉनिक दुकानें – मोबाइल फोन, चार्जर, बल्ब, पंखा आदि। सिलाई और दर्जी की दुकानें – कपड़े सिलवाने की सुविधा। मोबाइल रिपेयरिंग और एक्सेसरीज़ – मोबाइल फोन की मरम्मत और सामान। कोल्ड ड्रिंक और फास्ट फूड – चाट, फुल्की, समोसे, और शीतल पेय। निर्माण सामग्री की दुकानें – सीमेंट, गिट्टी, मोरंग आदि। विशेषताएँ: बाजार का वातावरण ग्रामीण होते हुए भी जीवंत और विविधतापूर्ण होता है। यह बाज़ार आस-पास के गांवों के लिए भी एक केंद्रीय ...

मेरी जीवन यात्रा

 विकास मौर्य की जीवन यात्रा: एक संघर्षशील सफर उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जनपद की तहसील टांडा के एक छोटे से गाँव पृथ्वीपुर में विकास मौर्य का जन्म हुआ। यह गाँव, जिसकी मिट्टी में सरलता, मेहनत और आत्म-संस्कार की खुशबू बसी हुई है, वहीँ से विकास ने अपने जीवन की पहली सांस ली। इनके पिता कृष्ण केवल मौर्य एक सज्जन और मेहनती व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने परिवार के पालन-पोषण में कोई कसर नहीं छोड़ी। माता स्वर्गीय चंद्रावती मौर्य एक बेहद ही स्नेहमयी और धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं, जिनका आशीर्वाद और संस्कार आज भी परिवार की नींव को मजबूती देते हैं। विकास मौर्य के दो भाई हैं — संजय मौर्य और डॉ. रंजय मौर्य। डॉ. रंजय मौर्य ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से BDS (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) की पढ़ाई पूरी की है और चिकित्सा क्षेत्र में सफलता की नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। बहन ममता मौर्य का विवाह दिल्ली में हुआ, और उनके दो प्यारे बच्चे हैं – बेटा कार्तिक और बेटी पिहू, जो परिवार की खुशियों का केन्द्र हैं। शिक्षा की शुरुआत: गांव से शहर की ओर विकास मौर्य की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही प्राइमरी स्कूल, प...