उत्तराखंड की यात्रा मेरी 3
भाग - 3: नैनीताल — झीलों, देवियों और धुंध से लिपटा शहर
बाबा के बाद नैनी माता का बुलावा
जब पहली यात्रा पूरी हुई, तो मन शांत था, लेकिन आत्मा में एक और प्यास बाकी थी। बाबा के दर्शन के कुछ समय बाद एक दिन फिर उमेंद्र भैया आए और बोले —
"विकास, इस बार फिर चलते हैं उत्तराखंड। इस बार नैनीताल भी चलेंगे, बाबा के दर्शन भी फिर से होंगे, और नैनी झील भी देखेंगे।"
दिल की गहराइयों से एक ही शब्द निकला — चलते हैं!
शायद इस बार माँ का बुलावा था — नैनी देवी माँ का।
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दूसरी यात्रा की शुरुआत – वही उत्साह, वही ऊर्जा
हमने फिर वही तैयारी की – टिकट बुकिंग, कपड़े, और कुछ घरेलू खाना। लेकिन इस बार मन में ज़्यादा स्थिरता थी, जैसे एक अनुभवी यात्री बन चुका था।
लखनऊ से काठगोदाम की ट्रेन थी और मन में चित्र बनने लगे थे – ऊँचे पहाड़, झील में उतरता सूरज, मंदिर की घंटियाँ और ठंडी हवा।
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काठगोदाम से नैनीताल की ओर – पहाड़ों की बाहों में
जब हम काठगोदाम पहुँचे, वहाँ से नैनीताल की बस ली। जैसे-जैसे बस चढ़ाई पर चढ़ती गई, हम बादलों में खोते चले गए। रास्ता ऐसा कि एक ओर गहरी खाई, दूसरी ओर चट्टानों से चिपकी सड़क – पर हर मोड़ के साथ एक नया दृश्य, एक नई कहानी।
कभी-कभी बस की खिड़की से बाहर देखने पर बादल इतने पास लगते थे कि लगता था हाथ बढ़ाकर छू लेंगे।
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नैनीताल – एक कविता सी बसी झील के किनारे
जब हम नैनीताल पहुँचे, पहली झलक ही अविस्मरणीय थी।
नीले आसमान के नीचे फैली बड़ी झील, उसमें तैरती नावें, किनारे पर बैठी सर्द हवा, और दूर पहाड़ियों पर टिके घर। मानो जैसे धरती ने खुद अपने आँसू से यह झील बनाई हो और उसमें जीवन का प्रतिबिंब रख दिया हो।
हमने सबसे पहले नैना देवी मंदिर का रुख किया। मंदिर के प्रवेश पर ही वो पवित्र ऊर्जा महसूस हुई।
माता के दरबार में आरती चल रही थी — घंटे, शंख और भक्ति की लहरें हर दिशा में गूंज रही थीं। मैंने वहां सिर्फ एक प्रार्थना की —
"माँ, तू ही मेरी रक्षा करना, सही राह दिखाना और मेरे जीवन को सरल बनाना।"
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नैनी झील – सुकून का दूसरा नाम
इसके बाद हम झील के किनारे कुछ देर बैठे। वहाँ की शांत लहरें, नावों की आवाजाही और झील पर गिरती धूप — यह सब किसी चित्रकार की कल्पना लगती है।
हमने नाव की सवारी भी की — पानी की लहरें जैसे मन की थकान को धो रही थीं।
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बाज़ार की चहल-पहल और पहाड़ी संस्कृति का अनुभव
नैनीताल का बाज़ार भी कम अद्भुत नहीं था। छोटी दुकानों में गरम कपड़े, लकड़ी की नक्काशी वाले शो-पीस, पहाड़ी चाय, और घर की बनी चीज़ें बिक रही थीं।
मैंने वहाँ से एक छोटी-सी लकड़ी की घंटी खरीदी – जो अब भी मेरे कमरे में टंगी है, हर बार देखकर मुझे ये यात्रा याद आ जाती है।
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वापसी – पर इस बार मन खाली नहीं था
शाम की ट्रेन पकड़नी थी, इसलिए हम थोड़ा जल्दी लौटे।
रास्ते में मैंने पहाड़ों को देखते हुए मन ही मन कहा —
"धन्यवाद बाबा, धन्यवाद माँ — तुमने मुझे बुलाया, अपनाया और जीवन के उस पहलू से मिलाया जिसे शब्दों में नहीं समझाया जा सकता।"
जब ट्रेन ने हल्के से सीटी दी और लखनऊ की ओर बढ़ी, तब मैं जान चुका था कि मैं अब पहले जैसा इंसान नहीं रहा। उत्तराखंड की उस धरती ने कुछ बदल दिया था मुझमें — शांति, श्रद्धा और जीवन के प्रति एक नई दृष्टि।
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❖ अगले और अंतिम भाग में:
👉 इस यात्रा के अनुभवों से मेरी सोच में कैसे बदलाव आया, कैसे गाँव लौटकर मेरा नज़रिया बदला, और अब मैं किन नई यात्राओं की योजना बना रहा हूँ...
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