उत्तराखंड की यात्रा मेरी
✨ मेरी पहली यात्रा उत्तराखंड की — एक आत्मिक अनुभव
लेखक – Drx. विकास मौर्य
स्थान – ग्राम पृथ्वीपुर, अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
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प्रस्तावना: एक बुलावा जो आत्मा तक पहुँचा
कभी-कभी जीवन में ऐसा अवसर आता है जो हमारी आत्मा को छू जाता है। ऐसा ही एक क्षण मेरी जिंदगी में उस दिन आया, जब मेरे बड़े भैया के प्रिय मित्र उमेन्द्र सिंह जी अचानक मेरे पास आए। भैया कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे, और ऐसे में उमेंद्र भैया ने मुझसे एक सवाल पूछा – "विकास, क्या तुम मेरे साथ बाबा नीब करौरी के धाम चलोगे?"
यह सवाल नहीं, एक निमंत्रण था। एक ऐसा बुलावा, जिसे मैंने अनसुना नहीं किया। मेरे दिल ने तुरंत कहा – हाँ! शायद बाबा नीब करौरी महाराज का बुलावा ही था, जो इस यात्रा के रूप में मेरे भाग्य में लिखा गया था।
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टिकट की कहानी: जब नियति खुद रास्ता बनाती है
उमेंद्र भैया टिकट बुक कराने साइबर कैफे गए, पर किस्मत में कुछ और ही लिखा था। टिकट बुक नहीं हो पाया। थोड़ा निराश थे, लेकिन मैंने उन्हें रोकते हुए कहा – "लाइए भैया, मैं अपने मोबाइल से करता हूं।" फिर क्या था, पेटीएम ऐप खोला, सीट ढूंढी, और शनिवार की रात 11:15 PM की लखनऊ से हल्द्वानी वाली ट्रेन में दो टिकट बुक कर दीं। दिल की धड़कनें तेज थीं, उत्साह अपार था।
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रात की तैयारी और बारिश की दस्तक
हमने झटपट कपड़े समेटे, कुछ खाने के लिए घर पर रोटियाँ और सब्जी तैयार की। तभी अचानक बारिश ने दस्तक दी – तेज, लगातार, जैसे आसमान भी हमारी यात्रा की पवित्रता को महसूस कर रहा हो। हमने एक बैटरी रिक्शा पकड़ा, मड़ियांव पुल पहुँचे, फिर वहाँ से ऑटो लेकर लखनऊ के चारबाग स्टेशन की ओर निकल पड़े। स्टेशन पर भी बारिश ज़ोरों पर थी, पर हमारे मन की लहरें उससे भी ज्यादा उफान पर थीं।
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ट्रेन की रात: बातों, भावनाओं और भूख की मिठास
ट्रेन समय पर थी। हम अपनी सीटों पर बैठ गए – दो युवा, दो बैग, और एक बड़ी उम्मीद लिए। उमेंद्र भैया अपने घर से कुछ व्यंजन लाए थे, मैं भी। ट्रेन में हल्की-हल्की बातें, मुस्कुराहटें, आसपास के मुसाफिरों की आवाज़ें – यह सब मिलाकर एक नई दुनिया बस रही थी।
रात धीरे-धीरे हमारे भीतर समा रही थी, और हमारी आंखें भी इस सुखद यात्रा की पहली नींद में डूबने लगी थीं।
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सुबह हल्द्वानी: पहली बार पहाड़ों का दीदार
सुबह लगभग 8:00 बजे हमारी आंखें खुलीं। हल्द्वानी स्टेशन आ चुका था। जैसे ही ट्रेन से नीचे उतरे – सामने ऊंचे, हरे, बादलों में लिपटे पहाड़!
मेरी आंखें फटी रह गईं। मैंने पहले कभी पहाड़ नहीं देखे थे। वो दृश्य शब्दों से परे था – मानो धरती का आंचल बादलों में झूल रहा हो।
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पहाड़ की गोद में पहला स्नान
हम दोनों स्टेशन पर ही गए, नहाए, साफ कपड़े पहने। उस ठंडे पानी से नहाना जैसे आत्मा को धुलने जैसा अनुभव था। उसके बाद हम पैदल ही हल्द्वानी बस अड्डे की ओर बढ़े। बसें पहाड़ की ओर जा रही थीं। और हम भी…
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पहाड़ी रास्तों का रोमांच
बस जब पहाड़ों की ओर चढ़ने लगी, तो मुझे ऐसा लगा जैसे किसी रोलर कोस्टर पर बैठा हूं। खतरनाक मोड़, गहरी खाइयाँ, तीखी ढलानें – दिल धड़कता जा रहा था, पर आंखें दृश्य से हटती ही नहीं थीं। डर और सौंदर्य का यह मिलाजुला एहसास शायद ही मैंने पहले कभी जिया हो।
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नीब करौरी धाम का पहला दर्शन
अंततः हम नीब करौरी बाबा के पावन धाम पर पहुँच ही गए। बादलों में लिपटा मंदिर, पहाड़ों से घिरी शांतिपूर्ण जगह, भक्तों की भीड़, और एक अद्भुत ऊर्जा – जैसे इस जगह की हर चीज़ जीवित हो।
हम उमेंद्र भैया के एक मित्र के कमरे पर रुके और वहीं से बाबा के दर्शन को रवाना हुए। जैसे ही मंदिर के द्वार के सामने खड़ा हुआ, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। अंदर प्रवेश करते ही आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी – ये आंसू थे श्रद्धा के, सच्ची भक्ति के।
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...जारी है
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